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विधायी प्रक्रिया

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विधान निर्माण की प्रक्रिया
विधान मण्डल का एक महत्वपूर्ण कार्य विधि बनाना है। हालांकि उसका यही एक मात्र कार्य नहीं है। विधि शब्द की स्वीकृत परिभाषा है किसी अधिनियम में दिया गया वह अनिवार्य निदेश जिसे विधिवत् रूप से गठित विधान मण्डल द्वारा वाद विवाद करने के पश्चात् विहित तरीके से पारित किया गया हो और जिसे यथास्थिति श्री राज्यपाल अथवा महामहिम राष्ट्रपति द्वारा अनुमति प्रदान की गयी हो और जिसे मानने के लिए प्रत्येक नागरिक बाध्य हो। विधि शब्द के अन्तर्गत कोई भी ऐसा नियम, विनिमय, उपविधि या उप नियम भी आता है जो किसी अधीनस्थ प्राधिकारी ने अधिनियम के उपबन्धों के अनुसरण में में स्पष्ट रूप से दी गई शक्तियों के अधीन तथा अधिनियम में निद्रिष्ट सीमाओं के भीतर रहते हुए बनायें हों।
    विधि अथवा अधिनियम अथवा कानून का मसौदा अथवा प्रारूप विधेयक के रूप में सभा के समक्ष लाया जाता है। विधेयक चाहे सरकार द्वारा पुरःस्थापित किया गया हो अथवा गैर सरकारी सदस्य द्वारा, तभी कानून बन सकता है जब उसे विधान मण्डल की स्वीकृति प्राप्त हो जाय तथा यथास्थिति राष्ट्रपति अथवा राज्यपाल की अनुमति प्राप्त हो जाय।
    विधेयकों को मौटे तौर पर दो भागों में बांटा जा सकता है:-
1- सरकारी विधेयक- इसे सरकार को कोई मंत्री ही पुरःस्थापित करेगा,
2- गैर सरकारी विधेयक- इसे मन्त्री के अतिरिक्त किसी भी सदस्य द्वारा प्रस्तुत किया जा सकता है।
विधेयकों की विषय वस्तु के आधार पर उन्हें पुनः निम्नलिखित श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है:-
1-  मूल विधेयक - (ऐसे विधेयक जिनमें मूलतः नये प्रस्ताव, विचार या नीतियां हों)
2-  संशोधन विधेयक - (ऐसे विधेयक जिनका उद्देश्य मूल अधिनियम में संशोधन करना हो)
3-  समेकन विधेयक - (ऐसे विधेयक जिनका उद्देश्य किसी विषय विशेष पर विद्यमान विधि का समेकन करना हो)
4-  समाप्त होने वाली विधियों को जारी रखने सम्बन्धी विधेयक
5-  अध्यादेशों का स्थान लेने वाले विधेयक
6-  संविधान संशोधन विधेयक
7-  धन विधेयक, तथा
8-  वित्त विधेयक।
    प्रत्येक विधेयक में निम्नलिखित बिन्दुओं का होना आवश्यक है:-
1-    नाम        -        इसमें यह बताया जाता है कि इस विधेयक का स्वरूप क्या हो।
2-    प्रस्तावना            -    यह वह खण्ड है जो विधेयक के नाम के बाद आता    है तथा     इसका आशय                     कुछ ऐसे तथ्यों पर प्रकाश डालना है जिन्हें अधिनियम में दिेय गये उपबन्धों                     को समझने से पहले स्पष्ट करना आवश्यक हो।    
3-    अधिनियम सूत्र        -    प्रत्येक विधेयक में विधेयक के खण्डों से पहले एक संक्षिप्त पैरा होता है, जो                     इस प्रकार होता है:
                        ‘‘भारत गणराज्य के..........................................वर्ष में
                        ..............................................यह अधिनियमित हो।’’
4-    संक्षिप्त नाम        -    यह विधेयक का लेबल या अनुक्रामणिका शीर्षक मात्र होता है तथा इसी                     नाम से उसे खोजा जाता हैें।
5-    विस्तार सम्बन्धी खण्ड    -    इसमें यह बाताया जाता है कि अधिनियम का विस्तार कहां-कहां हो।
6-    निर्वचन या परिभाषा संबंधी खण्ड  -    इसमें अधिनियम में प्रयुक्त शब्दावलियों की परिभाषा दी जाती हैं।
7-    नियम बनाने संबंधी खण्ड -    इसमें कार्यपालिका को विभिन्न विधियों को लागू करने के लिए नियम तथा                     विनियम बनाने की शक्ति    प्रत्यायोजित की जाती है।
8-    निरसन तथा व्यावृति    -    यह खण्ड विधेयक के अन्त में रखा जाता है ताकि जब कभी इस खण्ड का                     निरसन किया जाय तो अधिनियम का ढांचा पहले जैसा ही बना रहे।
9-    अनुसूचियां        -        
10-    उद्देश्य और कारण    -    इसे विधेयक को जारी करने की आवश्यकता प्रयोजन एवं विस्तार पर प्रकाश                     डाला जाता है।
11-    प्रत्यायोजित विधि संबंधी    -    इसमें अधीनस्थ विधायी शक्ति के प्रत्यायोजित करने     के प्रस्ताव होते हैं।
12-    वित्तीय ज्ञापन        -    प्रत्यायोजित करने के प्रस्ताव होते हैं।
    संविधान में संघ तथा राज्यों के बीच विधायी शक्तियों का विवरण 3 प्रकार से करने की व्यवस्था की गयी है:-
1- संघ सूची-इसमें वे सब विषय आते हैं जिनके सम्बन्ध में केवल संसद ही विधान बना सकती है।
2-राज्य सूची- इसमें वे विषय सम्मिलित हैं जिनके सम्बन्ध में किसी भी राज्य के विधान मण्डल को विधि बनाने की अनन्य शक्ति प्राप्त है।
3-समवर्ती सूची- इसमें उल्लिखित विषयों के सम्बन्ध मे ंसंसद तथा राज्य विधान मण्डल दोनों को विधि बनाने की शक्ति प्राप्त है। जो विषय समवर्ती सूची या राज्य सूची में नहीं आते हैं उनके सम्बन्ध में विधि बनाने की अवशिष्ट शक्ति संसद को दी गयी है। यदि समवर्ती सूची के किसी विषय पर संसद तथा किसी राज्य विधान मण्डल द्वारा विधियां बना ली गयी हों तो राज्य विधान मण्डल द्वारा निर्मित विधि अविभावी होगी तथा राज्य के विधान मण्डल द्वारा बनायी गयी विधि विरोध की मात्रा तक शून्य होगी।
    द्विसदनात्मक व्यवस्था में विधेयक दोनो सदनों में से किसी भी सदन में पुरःस्थापित किये जा सकते हैं, परन्तु धन विधेयक केवल सभा में ही पुरःस्थापित किया जा सकता है। किसी विधेयक को पुरःस्थापित करने से पहले अध्यक्ष द्वारा इस विषय में प्रार्थना किये जाने पर, गजट में प्रकाशन की अनुमति दी जा सकती है। यदि कोई असरकारी सदस्य किसी असरकारी विधेयक को पुरःस्थापित करने की अनुज्ञा के लिए प्रस्ताव करते हैं तो उन्हें ऐसी सूचना 15 दिन पूर्व देनी चाहिए।
    विधेयकों के पुरःस्थापित हो जाने के उपरान्त उन्हें सरकारी गजट में प्रकाशित किया जाता है। विधेयक के पुरःस्थापित किये जाने के बाद सम्बन्धित मन्त्री यह प्रस्ताव करते हैं कि विधेयक पर विचार किया जाय। वस्तुतः प्रत्येक विधेयक के 3 वाचन होते हैं। प्रथम वाचन का अर्थ है विधेयक पुरःस्थापित करने की अनुमति का प्रस्ताव, जिसके अन्तर्गत सभा की अनुमति प्राप्त हो जाने पर विधेयक पुरःस्थापित किया जाता है या ऐसे विधेयक का पुरःस्थापन जो राजपत्र में पहले प्रकाशित हो चुका हो अथवा ऐसे विधेयक का सभा पटल पर रखा जाना, जो दूसरे सदन द्वारा पारित किया गया हो।
    विधेयक के दूसरे वाचन में 2 प्रक्रम होते हैं। पहले प्रक्रम में विधेयक के सिद्धान्तों और उपबन्धों पर चर्चा की जाती है। इस प्रक्रम पर भारसाधक सदस्य द्वारा यह प्रस्ताव किया जाता है कि विधेयक पर विचार किया जाय। कोई अन्य सदस्य यह प्रस्ताव कर सकते हैं कि विधेयक को प्रवर समिति को सौंप दिया जाय अथवा उसे राय जानने के लिए परिचालित किया जाय। दूसरे प्रक्रम पर पुरस्थापित किये गये या प्रवर समिति द्वारा प्रतिवेदित रूप में विधेयक पर खण्डशः विचार किया जाता है। यह अध्यक्ष के स्वविवेक पर है कि वह विधेयक या विधेयक के किसी भाग को खण्ड प्रति खण्ड सभा के समक्ष रखें। अध्यक्ष प्रत्येक खण्ड को पृथक-पृथक लेते हैं और जब उसमें प्राप्त संशोधनों का निस्तारण हो जाता है तब अध्यक्ष यह प्रश्न उपस्थित करते हैं कि अमुक खण्ड या संशोधित खण्ड विधेयक का अंग माना जाय। विधेयक के खण्डों अथवा अनुसूची में किसी संशोधन की सूचना सामान्यतया 36 घण्टे पूर्व दी जानी चाहिए। ऐसा प्रस्तावति संशोधन विधेयक की व्याप्ति के भीतर ही होना चाहिए। यदि किसी संशोधन के साथ राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी अथवा राज्यपाल की सिफारिश आवश्यक हो तो सूचना के साथ ऐसी मंजूरी अथवा सिफारिश का संलग्न किया जाना अनिवार्य है। जब विधेयक के अन्य खण्डों तथा अनुसूची का निस्तारण हो जाता है तब अध्यक्ष विधेयक का खण्ड1, प्रस्तावना तथा शीर्ष को विधेयक का अंग माने जाने समबन्धी प्रश्न उपस्थित करते हैं।
    जब किसी विधेयक के सभी खण्डों और अनुसूचियों पर विचार पूरा हो जाय तो भारसाधक सदस्य यह प्रस्ताव करते हैं कि विधेयक को पारित किया जाय। सभी की अनुमति से विधेयक पारित हो जाने के उपरान्त उसे 4 प्रतियों में अध्यक्ष को प्रस्तुत किया जाता है, जो उसे प्रमाणित एवं हस्ताक्षरित तथा विधेयक की 3 प्रतियां परिषद् को विचारार्थ/सहमति हेतु भेज दी जाती है। यदि धन विधेयक के अतिरिक्त सभा द्वारा पारित तथा परिषद् को पहुंचाया गया विधेयक परिषद् से बिना किसी संशोधन के पारित होकर वापस प्राप्त हो जाय तो सचिव द्वारा सदन को इस बात की सूचना दी जाती है।
    धन विधयकों के सम्बन्ध में संविधान तथा प्रक्रिया नियमावली में विशेष उपबन्ध दिये गये हैं। कोई भी विधेयक धन विधेयक तभी हो सकता है जब उसमें संविधान के अनुच्छेद-199 में दी गयी परिभाषा के उपबन्ध हों। धन विधेयक केवल सभा में ही पुरःस्थापित किया जा सकता है।
    इस प्रकार जब कोई विधेयक संविधान के उपबन्धों के अनुसार सदन द्वारा पारित हो जाता है तब सचिव उसमें शाब्दिक और आनुशंागिक संशोधन करने के उपरान्त उस पर अध्यक्ष के हस्ताक्षर और यदि वह धन विधेयक हो तो संविधान के अनुच्छेद 199 (4) के अन्तर्गत आवश्यक प्रमाण अंकित हो जाने के उपरान्त विधेयक को 3 प्रतियों में राज्यपाल की अनुमति के लिये प्रस्तुत किया जाता है।  राज्यपाल महोदय की अनुमति प्राप्त हो जाने के उपरान्त उक्त विधेयक अधिनियम बन जाता है और अधिनियम बनने की घोषणा विधान सभा में की जाती है।  इस प्रकार विधान निर्माण की प्रक्रिया पूरी हो जाती है।